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Monday, April 22, 2013

बात एक अनकही सी

 सुनो छोटी सी  गुड़िया की ये दुःखभरी कहानी ...




"गुडिया" के साथ जो कुछ इंसानियत को शर्मसार करनेवाला हुआ वो यहीं तक नहीं थमा, पुलिस भी अपनी  दरिंदगी दिखाने से बाज  नहीं  और उसने F I R दर्ज करने की बजाये परिवार वालों पर ये कहकर दवाब डाला कि 2000रू  ले ले और मामला रफादफा करे.  लगता है दिल्ली पुलिस में   मानवता, संवेदनशीलता ख़त्म हो गई है. बात ज़ब मीडिया में आई तब जाकर पुलिस की आँख खुली और आननफानन  में रिपोर्ट  दर्ज की गई। और  पूरे देश में अब जो आक्रोश की लहर फैली है वह एक जनान्दोलन की शक्ल अख्तियार करती जा रही है जो अब जरुरी है, नहीं तो लगेगा की खून का रंग सफ़ेद हो चुका है.पर ...  लगता है क्या ऐसा करने से हमारे अन्दर का हैवान खत्म हो जायेगा ...???   क्या आपको नहीं लगता अब बहुत हो चुका ...?  अब तो  केवल एक बन्दुक और गोली की दरकार  है और जो भी हैवानियत दिखा रहा है उसके सीने पर दाग दो, नहीं तो उसके  हाथ पाँव काटकर फेक  दो ताकि  सारी उम्र  अपने गुनाह को याद करके जिए जिए और रोज मर मर के जिये। क्या आप ...ऐसा नहीं चाहते … ???  मै तो ऐसा ही चाहती  हूँ ...   

  अभी लगता है और भी कुछ और भी बाकि था, कुछ और मासूमों की मासूमियत कुचली जानी  बाकि थी  जिसका जिक्र करना फिर से इंसानियत को शर्मिंदा  करना है ... पर सवाल ये है कि आखिर ये सब कब थमेगा ...??? हमारे हुक्मरानों के सर पर जूं नहीं रेगने वाली और उन्हें तो आम आदमी की तरह सड़क पर नहीं चलना पड़ता है और न ही वे इन मासूम का दर्द समझ सकते, जब तक खुद के घर में आग नहीं लगेगी.
देश में पिछले २-3 दिनों से कुछ और मासूम गुड़ियाँ  हैवानियत का शिकार हुई हैं और राजनितिक दल  और केंद्र में बैठी सरकार के लोग केवल अपनी प्रतिक्रियाएँ देने में ही व्यस्त हैं।

जब तक  अमानवीय, पाशविक,हैवानियत से इतर कुछ  होता नहीं इस देश के लोंगों की नींद नहीं खुलती, और हम भी क्या करें   हजार पिछले २ हजार सालों से हमें जुल्म सहने की इतनी इतनी आदत पड़ चुकी है कि हम  चुपचाप रहना अधिक पसंद करते  हैं और अब तो हमारी संवेदना भी इतनी कुंद  चुकी है कि  किसी घटना का हम पर अब  कोई  प्रभाव भूले से भी नहीं पड़ता, वास्तव में हम ऐसे समाज में जी रहे  हैं जो मानसिक रूप   से बीमार  है। और यही कारण  है कि पिछले 2 हजार सालों से भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा है और अब तो ये जकड़न आदत सी हो गई है, जिसके चलते हम भूल गए हैं कि हम एक जिन्दा समाज में जीते हैं और हम इंसान हैं। भारत जैसा देश जहाँ नारी को "देवी " के रूप में पूजा जाता हैं उसी देश में नन्ही बेटियों को पुरुष अपनी लम्पटता के चलते अपनी हवस का शिकार बना रहा है, ये लानत की बात है पर कोई समझे तो सही इस बात को।

अब यदि वाकई ये देश  है तो  अब इसे सोना नहीं चहिये। अभी जरुरत है ऐसे इंसानियत से गिरे पाशविक हादसों को रोकने की ... पर इसके लिए जो सबसे जरुरी है वो है "नारी के प्रति अपनी आदिम सोच को बदलने की क्योंकि वह कोई वस्तु  नहीं इन्सान है और  जिसे आजादी   से जीने का हक़ है . ये हर नारी क्या हर मासूम गुडिया को तय करने दें कि वो उड़ना चाहती है तो उसके लिए खुला आसमान हमने तैयार करके देना है जहाँ कोई चिल या गिद्द उसकी उड़ान न रोक सके उसके जिस्म पर  अपने पंजे न गड़ा सके और न ही उसकी आत्मा लहूलुहान कर सके. 

आइये अपने मासूमों को एक ऐसा स्वस्थ्य सोच वाला भारत दें .  








Wednesday, July 11, 2012

हमारी सार्वजानिक मान्यताएँ


हमारी सार्वजानिक मान्यताएँ 


भारतीय जीवन रस-रंग व उत्सव का जीवन है. जीवन व्यक्तिगत व सार्वजनिक दो रूपों मैं विभक्त है, उसी के अनुसार ही हमारी व्यक्तिगत  और सार्वजनिक सोच  एवं मान्यताएं भी  हैं.सार्वजानिक मान्यताएं काफी प्रचलित तथा प्रयोगधर्मिता  के दायरे में आती हैं, प्रायः यही लगता है कि ये सार्वजनिक शिष्टाचार का उल्लंघन कर रही हों. इन मान्यताओं का दायरा प्रायः सम्पूर्ण भारत वर्ष में फैला हो सकता है.  भारत के दक्षिण में यह संकुचित रूप में प्रचलित हो किन्तु उत्तर एवं मध्य भारत में यह सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है. भारत में यदि धर्मनिरपेक्षता और पूर्ण प्रजातंत्र देखना हो तो तो इन मान्यताओं में आप खुलकर देख सकते हैं.
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आइये कुछ  सार्वजनिक मान्यताओं कि जिनसे पाठक गण भी प्रायः विदित हैं फिर से एक बार जान लें:-
लघुशंका का निवारण:- प्रायः  आम आदमी शंकाओं से घिरा रहता है और लाघुशंकाओं से तो और भी अधिक. ये शंका घर से बाहर निकलकर ही घेरती हैं  और व्यक्ति उसके निवारण के लिए प्रयासरत रहता है और वास्तव में इस शंका का निवारण जब तक न हो इन्सान सहज ही नहीं हो पाता . किसी भी शहर के गली, दीवारों कि आड़, वृक्ष के पीछे कहीं भी लोग अपनी इस शंका का निवारण करते देखे जा सकते हैं और ये भारत के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा इस कदर बन चुका है कि आम सहमती इसे मान्यता के रूप में स्थापित कर चुकी है जिसका विरोध करने का साह्स किसी में भी नहीं.

अभिनन्दन कि परम्परा:- मात अभिनन्दन कि परम्परा भारत में बहुत पुरानी है. ये संस्कारों में रची- बसी है. माँ के प्रति आदर कि भावना घर और सार्वजनिक जीवन में प्रत्यक्ष देखी जा सकती  है और ये इतनी  अधिक स्थापित हो चुकी है कि प्रेम या क्रोध में होने पर  गाली के रूप में धड़ल्ले से प्रयोग में लाई जाती है और इसे सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त है. लोगों में यह प्रचलन बेशक शर्मनाक  लग सकता है किन्तु यह सामाजिक रूप से बुरा  नहीं लगता यदि किसी को बुरा भी लगे तो विरोध करने के लिए इस मान्यता में स्थान ही नहीं है. और तो और बोलीवुड कि फिल्मों में भी आजकल ये एक फैशन के रूप में आ रहा है. माँ का गाली के रूप में प्रयोग एक ऐसे देश में जहाँ नारी कि पूजा करने कि हिदायत दी गई हो वो भी वेदों में तो इस तरह का आचरण वाकई शर्मनाक  है और इस पर लगाम स्वविवेक से ही लगे जा सकती है. 

रंगाई-छपाई कि कारीगरी:- छपाई प्रथा के रूप  में सर्वसाधारण में व्याप्त है. राह चलते कहीं भी छपाई का कार्क्रम करने कि पूरी स्वंत्रता प्राप्त है. ये वह क्षेत्र  है जिसे कानूनन  अपराध नहीं माना जाता है ये बात अलग है कि सार्वजनिक स्वच्छता हमारी किताबों में लिखी है परन्तु वह भी सिर्फ पढ़ने के लिए शेष है. आइये आपको छपाई के प्रकार बताएं- रास्ते चलते आप कही भी थूक सकते हैं और अपनी छपाई करके किसी को भी कृतार्थ कर सकते हैं. क्या मजाल कोई इसका विरोध कर सके क्योकिं इसके लिए इस चलन का प्रदर्शन करने वाला इतना समय ही नहीं देता कि आप सम्हल जाये, ये छपाई बिना पूर्व सूचना के कि जाती है. दूसरी छपाई कुल्ले के रूप में होती है, जिसका क्षेत्र कुछ विस्तृत होता है. तीसरी तरह कि छपाई सबसे खतरनाक होती है, पान खाकर अक्सर लोग उसे थूकने के मर्ज के शिकार होते हैं और जब भी वे इसे मुंह से बाहर फेकते हैं, इसकी छपाई लाल रंग में अवतरित होती है और स्थाई प्रभाव छोडती है. इस सार्वजनिक मान्यता का भुक्तभोगी विरोध के रूप में  गाली- गुफ्तार कर ले पर इसे स्वीकार तो करना ही पड़ेगा. 
मुफ्त की रंगाई -छपाई 
कचरे की मान्यता:- कचरा फेकने की प्रतियोगिता हर गाली-कूंचे व हर शहर में देखी  जा सकती है.अपने घर का कचरा किसी के भी घर के सामने या कहीं  भी ये सोच कर फेंका  जा सकता है की सारा भारत हमारा है बल्कि हम तो विश्व बंधुत्व की भावना भी रखते हैं. अगर कोई इस अपनत्व की भावना को न समझकर क्रोध करे तो उसकी नादानी पर गुस्सा न करके उसे बताये की ये आपका अपनापन दिखाने का तरीका है और  इससे अच्छा तरीका  कोई और हो ही नहीं सकता . यदि अगली बार कोई अपने आस-पड़ोस से अपनापन जाहिर करना चाहता हो तो अपने घर का कचरा उनके घर के सामने फेंक आये और उन्हें कृतार्थ करें बाकि इस मान्यता का अगला  चरण वे अपने आप तय कर लेंगे.
सहूलियत का कचरा 
  ये हैं हमारी  कुछ सार्वजानिक मान्यताएं आशा है यदि आप ने इन्हें अभी तक अमल में  नहीं लाया है तो जल्दी ही इन्हें आजमाएंगे जरुर.


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