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Tuesday, September 26, 2017

इंसान का इंसान न हो पाना...

इंसान इंसान नहीं है तो फिर...


बहुत सोचा कि इंसान वास्तव में खुद के बारे में क्या सोचता होगा...? अगर मुझसे जानना चाहेंगे तो केवल इतना ही कह सकूंगी कि अभी तक इसका जवाब नहीं मिला. पर सच है कि हम खुद से पूछ के देखें तो पाएंगे कि अभी हम पूरी तरह से इंसान हैं ही कहाँ...?

अगर आप इस बात से सहमत नहीं हैं तो इसकी एक बानगी आप भी देखें.:-

# हमने मंदिर की मूर्तियों को  करोड़ों के गहनों से सजा कर रखा है...और मंदिर के बाहर नन्हे फैले हाथों पर एक रूपये का सिक्का रखने से गुरेज करते हैं.

#छप्पन भोग भगवान् के सामने रखते हैं पर बाहर बैठे भिखारी को कुछ भी खाने के लिए देने के बजाय दुत्कार कर भगा देते हैं.

# मजारों पर रेशमी हरी चादर चढ़ा देते हैं , पर माजर की दहलीज के बाहर बैठे भिखारी को ठण्ड से कंपकपाते देखकर भी हमारा दिल नहीं पसीजता.

# गुरुदारे या मंदिर को बनाने के लिए हम लाखों दान दे देते हैं पर किसी ठेलेवाले या काम वाली बाई के मेहनत के पैसे मार लेते हैं. और उसकी जगह दूसरी बाई ढूँढ लेते हैं.

# दूसरों का दर्द मिटने और मानवता की खातिर कोई सलीब पर चढ़ गया था पर कोई अपने ही  माता-पिता के लिए इंसानियत को शर्मसार करते देखा है.

# भगवान् के मंदिर में हो खरे घी की ज्योत जलती रही उसे ही प्रसव के बाद बेटी पैदा करने पर खाने से मोहताज कर मार दिया जाता है.

# अपने माता-पिता को उनकी जिंदगी में भरपेट खाने को नहीं दिया वही उनके आज उनके नाम के भंडारे लगाता है.

# समाज में अपना सिर ऊँचा करने के लिए बाप ने अपनी बेटी जिस हाथों में सौपीं थी आज वही हाथ उसके जिस्म को नीला कर रहे हैं.

#सड़क में दुर्घटना में कोई घायल था और लोग उसका video बनाकर facebook और whats upपर अपलोड कर रहे थे पर उसकी सहायता को कोई नहीं आया और वो दम तोड़ गया.

# उन्होंने प्यार कर गुनाह किया और honur killing के नाम पर उनसे जीने का हक़ छीन लिया.

# बेटी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थी पर उसे पर उम्र  बढ़ जाने और दहेज़ ज्यादा देने के नाम पर उसे ब्याह कर उनके सपनों के पंख क़तर दिये.

# घर की औलाद ही अपने ऐशोआराम के लिए चोरी करे और इल्जाम गरीब काम वाली बाई, चौकीदार पर लगा कर जेल भेज दिया जाता है.
# दहेज़ के नाम पर बहू को जिन्दा जला या मार डाला जाता है.

# हमारे होनहारों को ये पसंद नहीं आता कि कोई लड़की उन्हें अच्छी लगती है पर  यदि वो उसे मना कर दे तो उनकी मर्दानगी को ठेस लगती है और वो उस लड़की से किसी भी प्रकार से बदला लेने पर उतारू हो जाता है. अब इसके लिए उसे लड़की से Rape ही क्यों न करना पड़े या फिर उस पर Acid Attack ही क्यों न करना पड़े.


इतना सब हम करते हैं फिर भी हम इंसान कहलाते हैं...?
 
वीणा सेठी...................

Sunday, September 1, 2013

भारतीय सच:.....ek ankaha sandarbh



सच का भारतीय सच:
 भारतीय मानसिकता दोहरेपन की शिकार है क्योंकि यहाँ जिन बातों का व्यवहारिक उपयोग नहीं करना होता उन्ही बातों को उपदेश या नीति वाक्यों में ढाल दिया जाता है. पूरी सामाजिक व्यवस्था यह जानती है की झूठ बोलना पाप है. किन्तु झूठ धड़ल्ले से बोला जाता है और झूठ इतना अधिक व्यवहार में लाया जाता है कि वह सामाजिक अनिवार्यता बन गया है. ऐसे वातावरण में सत्य के लिए स्थान शेष नहीं रहता. भारत जिन उच्चा-आदर्श मूल्यों की बात करता है यदि उन्हें स्थापित किया जाये तथा व्यवहार में लाया जाये तो एक ऐसे समाज की तस्वीर बनती है जिसमें अच्छाई एवं आदर्शों के अलावा कुछ भी न होगा. पर तस्वीर इसके ठीक विपरीत है. व्यवहारिकता में यहाँ  इन सब बातों को  कोई  भी अपनाने को तैयार नहीं है यही कारण है कि सच झूठ एवं भ्रम के गुरुत्व के नीचे दबा पड़ा रहता है और काफी परिश्रम के बाद ही निकालने पर ही बाहर आ पाता है.भारतीय समाज में व्याप्त इसी दोहरेपन के कारण आम आदमी यह जानते हुए भी कि सच बोलना चाहिए वह सच से दूर तक वास्ता नहीं रखना चाहता. जब सच के प्रति यह अपच की भावना है तो सत्य को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता. इसके अलावा ये सवाल भी उठता है कि सच इतना दुरूह क्यों है? जबकि वह सहज व दो टूक हुआ करता है. सच कि इस सहजता को पचा पाना भारतीय मानसिकता के लिए सदा ही मुश्किल रहा है.जिन उच्च आदर्शों या नैतिकता कि बात ढ़ोल बजा-बजा कर करते हैं क्यों उसको आम व्यवहारिकता में लेन आदमी से परहेज करता आया है?

 


Monday, April 22, 2013

बात एक अनकही सी

 सुनो छोटी सी  गुड़िया की ये दुःखभरी कहानी ...




"गुडिया" के साथ जो कुछ इंसानियत को शर्मसार करनेवाला हुआ वो यहीं तक नहीं थमा, पुलिस भी अपनी  दरिंदगी दिखाने से बाज  नहीं  और उसने F I R दर्ज करने की बजाये परिवार वालों पर ये कहकर दवाब डाला कि 2000रू  ले ले और मामला रफादफा करे.  लगता है दिल्ली पुलिस में   मानवता, संवेदनशीलता ख़त्म हो गई है. बात ज़ब मीडिया में आई तब जाकर पुलिस की आँख खुली और आननफानन  में रिपोर्ट  दर्ज की गई। और  पूरे देश में अब जो आक्रोश की लहर फैली है वह एक जनान्दोलन की शक्ल अख्तियार करती जा रही है जो अब जरुरी है, नहीं तो लगेगा की खून का रंग सफ़ेद हो चुका है.पर ...  लगता है क्या ऐसा करने से हमारे अन्दर का हैवान खत्म हो जायेगा ...???   क्या आपको नहीं लगता अब बहुत हो चुका ...?  अब तो  केवल एक बन्दुक और गोली की दरकार  है और जो भी हैवानियत दिखा रहा है उसके सीने पर दाग दो, नहीं तो उसके  हाथ पाँव काटकर फेक  दो ताकि  सारी उम्र  अपने गुनाह को याद करके जिए जिए और रोज मर मर के जिये। क्या आप ...ऐसा नहीं चाहते … ???  मै तो ऐसा ही चाहती  हूँ ...   

  अभी लगता है और भी कुछ और भी बाकि था, कुछ और मासूमों की मासूमियत कुचली जानी  बाकि थी  जिसका जिक्र करना फिर से इंसानियत को शर्मिंदा  करना है ... पर सवाल ये है कि आखिर ये सब कब थमेगा ...??? हमारे हुक्मरानों के सर पर जूं नहीं रेगने वाली और उन्हें तो आम आदमी की तरह सड़क पर नहीं चलना पड़ता है और न ही वे इन मासूम का दर्द समझ सकते, जब तक खुद के घर में आग नहीं लगेगी.
देश में पिछले २-3 दिनों से कुछ और मासूम गुड़ियाँ  हैवानियत का शिकार हुई हैं और राजनितिक दल  और केंद्र में बैठी सरकार के लोग केवल अपनी प्रतिक्रियाएँ देने में ही व्यस्त हैं।

जब तक  अमानवीय, पाशविक,हैवानियत से इतर कुछ  होता नहीं इस देश के लोंगों की नींद नहीं खुलती, और हम भी क्या करें   हजार पिछले २ हजार सालों से हमें जुल्म सहने की इतनी इतनी आदत पड़ चुकी है कि हम  चुपचाप रहना अधिक पसंद करते  हैं और अब तो हमारी संवेदना भी इतनी कुंद  चुकी है कि  किसी घटना का हम पर अब  कोई  प्रभाव भूले से भी नहीं पड़ता, वास्तव में हम ऐसे समाज में जी रहे  हैं जो मानसिक रूप   से बीमार  है। और यही कारण  है कि पिछले 2 हजार सालों से भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा है और अब तो ये जकड़न आदत सी हो गई है, जिसके चलते हम भूल गए हैं कि हम एक जिन्दा समाज में जीते हैं और हम इंसान हैं। भारत जैसा देश जहाँ नारी को "देवी " के रूप में पूजा जाता हैं उसी देश में नन्ही बेटियों को पुरुष अपनी लम्पटता के चलते अपनी हवस का शिकार बना रहा है, ये लानत की बात है पर कोई समझे तो सही इस बात को।

अब यदि वाकई ये देश  है तो  अब इसे सोना नहीं चहिये। अभी जरुरत है ऐसे इंसानियत से गिरे पाशविक हादसों को रोकने की ... पर इसके लिए जो सबसे जरुरी है वो है "नारी के प्रति अपनी आदिम सोच को बदलने की क्योंकि वह कोई वस्तु  नहीं इन्सान है और  जिसे आजादी   से जीने का हक़ है . ये हर नारी क्या हर मासूम गुडिया को तय करने दें कि वो उड़ना चाहती है तो उसके लिए खुला आसमान हमने तैयार करके देना है जहाँ कोई चिल या गिद्द उसकी उड़ान न रोक सके उसके जिस्म पर  अपने पंजे न गड़ा सके और न ही उसकी आत्मा लहूलुहान कर सके. 

आइये अपने मासूमों को एक ऐसा स्वस्थ्य सोच वाला भारत दें .