Monday, December 31, 2012

गुजरते साल २०१२ कि







गुजरते साल २०१२ कि बिदाई बेला और आने वाले साल २०१३ कि भोर में...





साल २०१२ के गुजरने में केवल कुछ २४-२५ मिनिट का समय ही बाकि है. ये साल भी गुजर जाने को है पर ये साल का आखरी पल बीते सालों से कुछ क्या बहुत कुछ अलग है, साल के इस पल के कुछ दिन पहले लगता है भारत के आने वाले कल कि सामाजिक और राजनीतिक परिधृश्य को बदल देने वाला होगा. किसी मासूम कि शहादत साल के गुजरते गुजरते सदियों से सोये हुए भारत को झकझोर कर जगा गई और भारत के लोगों को ये जिम्मेदारी दे गई कि वे नारी कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में सम्मान करें और उसके सम्मान कि रक्षा भी करें. आज गुजरते हुए  साल २०१२ कि बिदाई बेला में और आते हुए साल २०१३ कि पास आती भोर में सम्पूर्ण भारत के वासी ये संकल्प ले कि वे हर व्यक्ति  के  आत्मसम्मान के साथ जीने का हक दे किसी का ये हक किसी से न छिना जाये.
 क्या आपको नहीं लगता कि 'दामिनी' की शहादत किसी भी तरह से जाया नहीं जानी चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो आने वाली नस्लों को हम शर्मिंदा करेंगे और नारी को सम्मान से सिर उठा के जीने का मौका नहीं दे पाएंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की हम अपने वैचारिक दोगलेपन में नारी को 'देवी' तो माने बैठे हैं पर उसे इंसान मानने  से आज भी कतराते हैं, हर घर में नारी अस्तित्वमान है और उसका सम्मान और उसकी मर्यादा की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है, इसकी शुरुआत घर से ही हो तभी हम वास्तविक  में भारत का सम्मान कर पाएंगे।









Wednesday, December 12, 2012

12.12.12 ... और कितने बारह ...???

12.12.12 ...  और कितने बारह ...???





 आज का दिन ऐतिहासिक बनने वाला है  ऐसा media के भिन्न प्रचार माध्यमों इतना प्रचारित और प्रसारित कर दिया है कि मन का हर कोना 12-12 हो गया है। सुबह- सुबह जब समाचार  पत्र हाथ में आया तो जैसे ही दृष्टी पहले पन्ने पर गई तो पूरा पन्ना ही 12मय हुआ पड़ा था , आज के दिन लोग शादी,निकाह  marriage जो भी बन पड़ रहा है पूरी एड़ी -चोटी का जोर लगा कर करवा रहे हैं। आज तो कुछ भी कहो पण्डित, पादरी और मौलवी की चाँदी ही चाँदी है,याने दसों अंगुलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में। आज के दिन ये सब अपनी जेबें भरने में लगे होंगे और आज का दिन तो इन्ही का मान  के चलिए। ये तो हुई शादी याने  के बसंत की बात अब इसके बाद के अगले कदम की बात भी हो जाए। याने शादी तो हुई तो अगली पीढ़ी की जिम्मेदारी भी जरुरी हो जाती है। चलिए इसकी तैयारियों के बारे में भी media से ही जान पाए और ये भी पता चल गया कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी  है और हम आज भी अनाड़ी के अनाड़ी ही रह गए।

अस्पतालों में बच्चों की dilevery आज के दिन करवाने के लिए माता-पिता doctors को मुँह माँगी फ़ीस देने को तैयार हैं और धन्य है इस धरती की माएँ जो अपने जीवन को दाव पर लगाकर गुणवान संतान को जन्म देने के लिए तैयार हो गई हैं और धन्य हैं वो पिता जो इस महान कार्य के लिए अपनी तिजोरियों का मुह खोले खड़े हैं और doctors  की तो पूछो ही मत, आज तो उनकी सोना-चाँदी -हीरा-मोती सब कुछ है। हो भी क्यों न पंडितों ने आज के दिन पैदा होने वाली संतानों को सर्वगुण सम्पन्न पहले से ही  घोषित कर दिया है। अब आप ही बताएं कि यह दिन ऐतिहासिक हुआ कि नहीं ...?

अपनी आने वाली संतान के लिए लोग क्या-क्या कर गुजर रहें हैं आज के दिन ये तो हमने ख्वाब में भी नहीं सोचा था और हमें आज के दिन दुनिया में आने वाले नौनिहालों की किस्मत पर रश्क हो रहा है और हमारे दिल से एक ठंडी आह निकल आई की काश  ...! हम भी आज के दिन जन्म ले पाते क्योंकि अब आज के बाद तो ये दिन हजारों सालों में भी नहीं आने वाला और इस बात के तम्मनाई  होकर हम अपनी आत्मा को अंतरिक्ष में भटकने के लिए नहीं छोड़ सकते थे। 

अब हमारे लिए परशानी का सबब ये हो गया है कि हम ऐसा क्या करें ...??? कि  ये दिन हमारा नाम इतिहास में न दर्ज करवा सके पर इतना तो हो ही सके  है किहम इसे अपने  लिए कम से कम एतिहासिक तो बना सकें ...!!?? सुबह से शाम होने को आई और हमारा आज सारा दिन ही इस बात पर विचार करने में निकल गया किहम ऐसा क्या करें कि  हमारा ये दिन यादगार  ...अरे नहीं ...!! कम से कम ऐतिहासिक तो बन सके क्योंकि हम कोई मशहूर हस्ती तो है नहीं ...!! जिसे ये दिन celeberate करने का न्यौता मिलेगा या फिर कोई हमारे लिए इस दिन को ऐतिहासिक बना दे ...?? अब तो ऐसा है कि हमने अपनी सोच के दरवाजे बंद कर लिए हैं और   अगर आप से हो सके तो हमारे लिए कोई सुझाव ही बता दें क्योंकि अभी भी कुछ घंटे बाकि हैं इस दिन के खात्मे में .... पर हाँ और कुछ तो नहीं हुआ, सुबह-सुबह जब मै रोजाना सैर को जाती हूँ तो वैसे ही आज भी सुबह निकली थी तब एक बूढी अम्मा चौरस्ते के मंदिर के दालान पर बैठी थी और वो ठण्ड से ठिठुर रही थी, मुझे ये देखकर अच्छा नहीं लगा और तुरंत घर वापस लौट कर माँ को बताया तो वे अपना एक स्वेटर लेकर उसे दे आई और साथ ही उसे कुछ रुपये दिए ताकि वो कुछ लेकर खा सके। मुझे पता था माँ ये सुनकर जरुर कुछ न कुछ जरुर करेंगी। माँ  की दरियादिली ने मेरे मन में इस विश्वास को और भी पक्का कर दिया कि चाहे कुछ भी अच्छाई कभी ख़त्म नहीं हो सकती।

पर ...मेरी सोच अभी भी वही  अटकी है कि ऐसा क्या किया जाये कि 12.12.12 मेरे लिए भी ऐतिहासिक दिन साबित हो ....क्या आपके पास कोई idea  है तो कृपया रात के 12 बजे से पहले जरुर बता दें ... भगवान् आपका जरुर भला करेगा।  


                                                                  वीणा सेठी ...................................................................................................................................................................

Tuesday, November 13, 2012

दीपोत्सव

 दीया उम्मीद का 








इस  प्रछन्न अन्धकार में;
इक दीया मै
उम्मीद का जलाताहूँ,
 और
वहाँ रख देता हूँ;
जहाँ
अँधेरा अभी भी बाकि है,
फिर
इक और दीया
इस उम्मीद से
रौशन करता हूँ:
कोई और भी
इसी तरह से
इक और दिया जलाएगा ;
और
जहाँ-जहाँ तिमिर  पसरा होगा,
वहाँ-वहाँ से वह निकल जायेगा।
और ...और
दीयों की इस श्रृंखला में
पूरा देश दीपोत्सव का त्यौहार,
दीपावली हर्ष और आनंद से मनायेगा।





Saturday, November 3, 2012

कुर्सी की महिमा

हाय रे ! जालिम ये कुर्सी ..........................





"कुर्सी" शब्द कानों में पड़ते ही आँखों विस्तार का संकेत देने लगती हैं याने वे अचम्भे से फ़ैल जाती हैं और चहरे पर विस्मय और ख़ुशी का भाव आ जाता है। हर व्यक्ति की आँखों में एक पहचान का भाव उमड़ पड़ता है। बड़े क्या /बूढ़े क्या/पुरुष हो या स्त्री, और तो और बच्चे तक भी इस कुर्सी से इस कदर परिचित हैं कि अब वह किसी परिचय की मोहताज नहीं रह गई है.
'कुर्सी ' शब्द कानों में क्या पड़ता है मानों  कानों में रस घुल जाता है,और तो और उसके आनंद में आँखे बंद होकर उसका स्वप्न जागी आँखों से देखने लगती हैं। कुर्सी का  जादुई स्पर्श बिल्कुल ऐसा है जैसे परस छूकर लोहे जी सोना बना दे, अगर हमारी  बात पर भरोसा नहीं है तो एक बात उस पर बैठ कर देखिये अगर उसके जादुई स्पर्श से आप भी उसके रंग में न रंग जाएँ तो कहना।..!

आइये आज जान ही लें क्यों लोग कुर्सी के आकर्षण में अपनी सुधबुध खो देते हैं:-

# कहते हैं ना  कि किसी किसी भी  चीज का मोह बुरा होता है और उसकी अति तो और भी बुरी  होती है।  पर कुर्सी की तो मिसाल ही अलग है, ये तो जब ही पता लगता है जब आप कुर्सी पर बैठेंगे.पर एक बात तो है कुर्सी भारत के संविधान की प्रस्तावना में वर्णित 'secular' को पूरी तरह से सार्थक करती है। याने इस पर जो चाहे बैठ सकता है।

# 'कुर्सी' एक  चुंबक की तरह  है, जिसकी तरफ हर कोई खीचा चला आता है।इस पर बैठने से पहले एक आम आदमी आम ही रहता  है, पर कुर्सीनशीं  होते ही वह स्वयं में ही विशिष्ट हो जाता है उसका रुतबा 5स्टारी हो जाता है, वह आम आदमी की तरह  बंद कर  है, जिस  और कारण और नाम के लिए वह कुर्सी बनी होती है, वह वही गुण  ग्रहण कर लेता है।  उसका पूरी तरह से कायापलट हो चूका होता है।  ये परिवर्तन वाकई हैरतअंगेज होता है, और जैसे जैसे दिन बीतते  जाते हैं वह उसके रंग में रंगता जाता है। आपका कितना भी आत्मीय न हो एक बार कुर्सी पर  बैठने के बाद वह निश्चित पर  जान लीजिये कि वह 'कुर्सी' की भेंट चढ़ चुका है ... अब आप अपने प्रिय दोस्त को खो चुके हैं , आप चाहें तो गाना गा सकते हैं---" दोस्त-दोस्त न   ..." अब वह आपको तभी वापस मिलेगा जब स्थायी  तौर  पर कुर्सी त्याग चुका होगा। 

हमारे देश में तो "कुर्सी" का मोह कहो या कुर्सी का लोगों से मोह कहो जग जाहिर है ..."  देखिये तभी तो आजादी के 65 सालों बाद भी कुर्सी ने "नेहरू-गाँधी" परिवार का आज तक साथ नहीं छोड़ा, और देश को बार-बार प्रधानमंत्री ढूंढने की जहमत से बचा लिया।
" कुर्सी " की महिमा के बारे में और क्या बताऊँ ... आप सभी वाकिफ हैं।


                                                                                                                                
                                                                                                                      वीणा  सेठी 

   
                                                                     

Tuesday, October 2, 2012

2oct बापू की जन्मतिथि

मोहनदास करमचंद गाँधी से महात्मा बनने तक का वो पल


वकील मोहनदास करमचंद गाँधी ने जब साउथ अफ्रीका की यात्रा पर थे और रेलवे के प्रथम श्रेणी के डब्बे में पूर्णतया  वैधानिक टिकिट से यात्रा  करने पर भी अंग्रेज द्वारा उन्हें डिब्बे से बाहर फिकवा दिया गया, ये कहकर कि एक काला  व्यक्ति याने अश्वेत इस तरह से प्रथम श्रेणी के डब्बे में यात्रा करने की हिम्मत भी नहीं कर सकता, नटाल के स्टेशन पर जब सामान समेत करमचंद गाँधी को लगभग फेंक दिया गया था तब उस समय के हिसाब से एक मामूली लगने वाला पल ही था। ये उस समय किसी को भी नहीं पता था कि ये मामूली पल इतिहास की धारा  को मोड़ने वाला पल साबित होगा . वास्तव में ये ही वो पल था जिसने मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा बनाया।


इसी पल ने भारत की आजादी याने स्वतंत्रता की नींव राखी। ये ही वो पल था जब तय हो गया था कि आने वाले वर्षों में भारत  आजादी को हासिल करेगा और वो भी एक ऐसे हथियार से जिसका इस्तेमाल मोहनदास ने भारत से हज़ारों मील दूर एक विदेशी जमीं पर अपने प्रति किये गए भेदभाव के लिए वे उपयोग में लायेंगे। "अंहिसा" वो शस्त्र था जिसे अंग्रेजों के विरूद्ध पहले साउथ अफ्रीका में और बाद में भारत में इस्तेमाल किया गया और उस राज के सूरज को अस्त होने पर मजबूर किया जिसके विषय में कहा जाता था कि "ब्रिटिश राज" में सूरज कभी अस्त नहीं हुआ। वास्तव में ये विश्व के इतिहास में दर्ज वो पल था जिसने एक साधारण इंसान को महात्मा बना दिया, वास्तव में व्यक्ति प्रायः  साधारण ही हुआ  हैं पर जिन पलों में वे कोई निर्णय लेते हैं जो कि  आने वाले वक्त में इतिहास का निर्माण करने वाले साबित हुआ करते हैं। और ऐसे ही पल इन व्यक्तियों को महान बना दिया करते हैं।

                           वीणा सेठी  

Wednesday, September 12, 2012

देशद्रोह की परिभाषा ...

कौन है देशद्रोही ...???




 असीम त्रिवेदी को देशद्रोही घोषित कर दिया गया ... एक कार्टूनिस्ट जो कल तक सबके लिए एक अनजाना  नाम और चेहरा था आज सारा  भारत उसे पहचानने लगा है क्योंकि उसने राष्ट्रीय चिन्ह के साथ छेड़छाड़ करने की हिमाकत की है।

राष्ट्रीय चिन्ह के साथ छेड़छाड़ कर के- प्रथम दृष्टि में ऐसा ही प्रतीत होता है किन्तु सोचा जाये तो उन्होंने उससे मिलती जुलती आकृति का कार्टून बनाकर फिर से एक विवाद खड़ा करने की कोशिश की है कि जिससे आम  जनता के साथ साथ सरकार भी चैन की नींद से जाग उठे, पर ... ऐसा होगा लगता तो नहीं है। उलटे असीम त्रिवेदी को आनन फानन देशद्रोही करार दे दिया गया। आप भी देखिये  इस कार्टून से किस प्रकार के देशद्रोह की बू आती है ... ???

 cartoon 



घटनाक्रम तो सभी पाठक जानते ही हैं ... जिसके विस्तार में जाये बिना ही इस प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है की क्या एक कार्टून किसी भी सरकार की नीव हिला सकने में इतना सक्षम है कि सरकार को उसके रचनाकर को देशद्रोही कहकर जेल में डालना पड़ जाये और उसे तुरन्त ही रिहा करने की सिफारिश भी करनी पड़ी । कांग्रेस सरकार पहले भी ऐसे ही कई अविवेकपूर्ण निर्णय ले  चुकी है और उसे मुँह की खानी पड़ी। 

पर सबसे बड़ा सवाल अभी भी मुँह बाएँ खड़ा है ...
देशद्रोही कौन ...???

इसे थोड़ा और भी स्पष्ट करते हैं:

सबसे बड़ा देशद्रोही कौन ...???

असीम त्रिवेदी जैसे रचनाकार,कलाकार या फिर उनकी बरादरी के लेखक ...???

या फिर 

हमारे देश के सम्मानीय और पूज्यनीय नेता ...??

हमारे देश के नेता जो फिलहाल की सरकार में  बैठकर अपनी  सृजनात्मक क्षमता की परिचय घोटालों की शक्ल में दे रहे हैं ... और बेशर्मी से ये कह रहे हैं कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं। देश का ...00000 पता नहीं  कितने  हजार करोड़ों का घोटाला  कर चुके हैं और जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा  हजम कर लिया और एक डकार भी नहीं ली।  उनसे कोई ये प्रश्न करने की जरुरत ही नहीं कर सकता की देश का इतना पैसा कहाँ गया ...??

जो देश का पैसा खा रहे हैं।

जो देश में भ्रष्टाचार फैला रहे हैं ... विशेष रूप से नेता 

जो देश में मिलावटी सामान बेच रचे हैं ..
 
देश की  नौकरशाही जिससे आम जनता त्रस्त है ...

या फिर उन बेईमानों से जो रिश्वतखोरी का बाजार गर्म किये हुए हैं।

ये लोग देशद्रोही हैं या  ... फिर असीम  त्रिवेदी  जैसे लोग ...???

इसका फैसला होना अभी बाकि है .... आपका क्या कहना है ...??

अपनी राय आप  दें comment के रूप में।
-----------------------------------------------------------------------वीणा सेठी

Tuesday, August 14, 2012

आजादी के जश्न में कैसा हो भारत .


कैसा चाहिए भारत...................?

भारत विभिन्नताओं का देश है, ' अनेकता में एकता ' का नारा आज इसकी पहचान बन चुका है. दुनिया की तीसरी बड़ी उभरती हुई शक्ति के रूप में अपना एक मुकाम हासिल करता जा रहा है. ये तस्वीर का एक पहलू है पर दूसरा पहलू भी वाकई ऐसा ही है ..........................

 कड़ों की दृष्टी से भारत एक स्वयम्भू  संपन्न राष्ट्र हो रहा है , पर क्या ये वो भारत है जो हर भारतीय चाहता  है. भारत की ये सम्पनता दुनिया को दिखाई दे रही है, पर कहते है ना कि चिराग तले हमेशा अँधेरा होता है ऐसा ही कुछ  इस  ’ Shine  India ‘ कि दूसरी तस्वीर भी है जो पिछले 60 सालों में भी नहीं बदली. आज हर भारतीय के जेहन में ये सवाल है कि कैसा भारत वे चाहते हैं………..??



भ्रष्टाचार से युक्त नहीं मुक्त भारत हो………… भ्रष्टाचार के मामले में भारत आज विश्व मंच कि 8 वीं पायदान पर खड़ा है और हर भारतीय इससे इतना त्रस्त हो चुका है कि उसे इस भ्रष्ट वातावरण में साँस लेना दूभर हो रहा है. पर मुश्किल यह है कि हम भ्रष्टाचार को कोसते अवश्य हैं पर उसके निदान के उपाय कि बात आती है तो मौन धारण कर लेते हैं.
भाई-भतीजावाद से युक्त नहीं मुक्त भारत हो………………… ये समस्या इतनी गहरी जड़ें जम चुकी है कि इसका निदान आसान नहीं. भारत के राजनितिक गलियारों से लेकर घर कि दहलीज तक भाई-भतीजावाद का परचम पूरे वेग से फहरा रहा है.किसी  भी राजनितिक पार्टी में किसी नेता का रिश्तेदार होना राजनीति के व्यवसाय में एक अतिरिक्त योग्यता है जो आपके जीवन भर के भरण-पोषण का स्थाई इंतजाम कर देता है और अगर आप किसी भी नेता के पुत्र या पुत्री हैं तो समझिये  की कुर्सी ताउम्र है आपकी. इस तरह के वातावरण ने भारत की राजनीति के तालाब को इतना गन्दला कर दिया है की उसे पारदर्शी करने में पीढियां निकल जाएँगी , वस्तुतः राजनीति में इतना नैतिक  पतन हो चुका है की  आम इन्सान इससे दूर रहना चाहता है, पर इस तरह का भारत आम इन्सान को नहीं चाहिए , पर इसे बदल भी वही सकता है.
 नौकरशाही से युक्त नहीं मुक्त हो भारत…..………………… नौकरशाही भारत को ब्रिटिश राज की देन है, और इससे हर भारतीय पीड़ित है. यह भारत की हर तरह की व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रही है . भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी नौकरशाही की छाया में फलफूल रही है. और इतने गहरे उतर चुकी है की इसको जड़ से उखाड़ फेकने के लिए तो एक भागीरथी भी कम पड़ेंगे.

छुआछुत व जातिवाद ये युक्त नहीं मुक्त भारत हो ………………. छुआछुत व जातिवाद हजारों सालों का फैला कोढ़ है जिसका इलाज बहुत जरुरी है. ये बीमारी समाज तथा देश की प्रगति में एक बहुत बड़ा रोड़ा है. हमारी सोच में ये विकृति इतने गहरे पैठ चुकी है की इसे हम स्वयं ही दूर कर सकते हैं. इससे मुक्त भारत ही हमारे सुख की गारंटी है.

पाखंड ये युक्त नहीं मुक्त भारत हो….……….. धर्म  में पाखंड इतना अधिक व गहरा है की आम इन्सान अपनी सोच को गिरवी रख देता है और धर्म में फैले अनाचार को भी धर्म का हिस्सा मानकर उसका पालन पुर जोश से करता है, ये नैतिक पतन की परकाष्ठा है और इससे आम इन्सान का ही नुकसान हो रहा है. जिस दिन आम आदमी ये समझ जायेगा की धर्म के ठेकेदार उसे उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है वह उस पाखंड से मुक्त हो जायेगा और यही असली  भारत होगा.

अज्ञानता से युक्त नहीं मुक्त हो भारत………….. भारत की 40 % जनता आज भी अज्ञानता के अंधकार में जीवनयापन कर रही है.अज्ञानता केवल शिक्षा की ही नहीं है , शिक्षितों में भी अज्ञानता की मात्रा भरपूर है.ज्ञान का प्रकाश केवल शिक्षा से नहीं आता विचारों का परिष्कृत होना भी आवश्यक है. अतः अन्धविश्वास से मुक्ति ही अज्ञानता से मुक्ति पर्व होगा.
 घोटालों से युक्त नहीं मुक्त भारत हो  ……………………… आज भारत घोटालों के लिए बहुत  ही उपयुक्त भूमि है. जमीं की घोटाले, शक्कर के घोटाले, गरीबों को बाटें जाने वाले अनाज के घोटाले, देश के रक्षा के लिए हथियारों में भी घोटाले गिनने बैठेंगे तो एक लम्बी फेहरिस्त होगी घोटालों की. पर लाख टके का सवाल है की क्या वास्तव में हम ऐसा भारत चाहते हैं? नहीं………………..तो हमें स्वयं चेष्टा करनी होगी इन घोटालों को रोकने  की.

मिलावट से युक्त नहीं मुक्त भारत हो …………………….. मिलावट खाद्यानों, घी, दूध, सब्जियों याने हर चीज में मिलावट और तो और भारत के वायुमंडल में इतनी अधिक मिलावट हो चुकी है की हमारी सोच भी मिलावट से भरपूर हो चुकी है नही तो कोई कारण नहीं की हमारे चारों ओर का माहौल जो इतना अधिक प्रदूषित हो चूका है उसका प्रभाव हम पर न पड़ रहा हो?
इन सब तरह की मिलावट का हमें विरोध करना ही होगा ओर उन्हें रोकना भी होगा अन्यथा इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर साफ़ दिखाई देगा .
 

अपराध एवं आतंक से युक्त नहीं मुक्त हो भारत….………….. राजनीती और अपराध का भारत में चोली-दामन का साथ है. कानून तोड़ने में राजनेताओं का कोई सानी नहीं. कुकुरमुतों की तरह राजनेताओं की पैदाइश इस देश में जरी  है और उसके साथ ही अपराध का ग्राफ उपर की ओर जा रहा है. अपराध इसलिए भी पनप रहा है क्योंकि रक्षक ही भक्षक बन गया है, इस देश की पुलिस ही अपराध को संरक्षण देती है और निरपराध को जेल में डालने में गुरेज नहीं करती, जिसका परिणाम ये हो रहा है कि आम आदमी का कानून से विश्वास उठ गया है. केवल यहीं तक बात रहती तो कोई  बात नहीं थी,अब देश आतंकवाद से भी जूझ रहा है. और आतंक का जो चेहरा सीमा पार से प्रायोजित हो रहा है वह काफी भयावह है. इसका जल्दी  निदान भारत के हित में होगा अन्यथा देश जिस तरह से अभी समस्याओं से जूझ रहा है उसमे आतंकवाद का तड़का काफी विध्वंसक साबित होगा. अभी देश की कोई भी सीमा सुरक्षित नहीं है इसके साथ ही देश में आन्तरिक समस्याओं का भी अम्बार लगा है – नक्सलवाद, माओवाद , आतंकवाद जैस परशानियाँ और राज्यों के बंटवारे की समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं.

अब जरुरत इस बात की है की हम कैसा भारत चाहते हैं यह  हमारे हाथ में है. अनुशासन वह भी स्वयं पर बहुत जरुरी है तभी हम  जिसे  'भारत' कहते हैं पा सकते हैं.
                                                                                                                                                                   

 इस लेख  को पढ़ने के बाद पाठक अपनी प्रतिक्रिया आवश्य दें क्योंकि तभी पताजोड़  लग सकेगा कि हम वास्तव में कैसा भारत चाहते हैं और कुछ छूट  गया है तो कृपया उसे अपनी टिप्पणी द्वारा जोड़ दें 


Tuesday, July 31, 2012

गुलामी से भरी भारतीय मानसिकता


'ब्रेन-ड्रेन व भारतीय मानसिकता

 2000 हजार सालों तक भारत पर विदेशी राज्य करते रहे. यवन, हूण,कुषाण,शक,खिलजी ,मुग़ल,पुर्तगाली और अंत में अंग्रेजों ने एक के बाद एक भारत पर आक्रमण किया और यहाँ कि संपदा को लूटा और एक लम्बे समय तक 2000  सालों तक भारत को गुलाम रखा.भारत का क्रमिक इतिहास यही कहता है.


 
आजतक हमें सब बातें कि पर इस सत्य से हमेशा नजर चुराते रहे कि आखिर क्या कारण है कि हम 2000 साल तक गुलाम रहे? वास्तविकता यही है कि यह गुलामी अपने स्वभावगत कमजोरियों के कारण हमने स्वीकार कि और झुझारुपन के अभाव में आज भी स्वतंत्र होते हुए भी इस मानसिकता से छुटकारा नहीं पा सके. 'सत्य' पर सम्भाषण तो हमे अच्छा लगता है पर 'सच का सामना' करने से हम घबराते हैं. वास्तव में हमारी  सामाजिक  और राजनितिक व्यवस्था में ही गुलामी के बीज हैं.

अंग्रेज तो इस देश से चले गए पर अपनी लेपालक संतानें यही छोड़ गए, जो आज भी काया से भारतीय होते हुए भी मन से अंग्रेजों कि गुलाम है और पश्चिम का गुणगान करने में चाटुकारिता कि सारी हदें तोड़ देती है.


मानसिक गुलामी हमारे व्यवहार व कियाकलापों में झलकती है. प्रतिभाओं कि भारत में  कमी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भारतीय प्रतिभा का लोहा मान चुकी है पर अपने घर में इन प्रतिभाओं को यथोचित सम्मान नहीं मिलता और वे पलायन कर जाती हैं. यही कारण है  कि ये प्रतिभाएं दूसरे देशों को लाभान्वित कर रही हैं. जब इन्हें वहां सम्मान मिलता है और दुनिया इन्हें पहचानने लगती है तब हमारी नींद खुलती है, तब हम इस फारेन रिटर्न प्रतिभा को हाथों हाथ लेते हैं.

क्या ये हमारी हजारों सालों कि मानसिक गुलामी का ज्वलंत प्रमाण नहीं? जब तक हमारी प्रतिभा को पश्चिम का ठप्पा नहीं लग जाता हमें उनकी प्रतिभा दिखाई ही नहीं देती. हम आखिर कब तक स्वयं को पश्चिम के चश्में से देखते रहेंगे?

इस मानसिक गुलामी के चलते ही हम अपने महत्त्व को कम करके आंकते हैं.एक पढ़ा लिखा व्यक्ति हमें कम पढ़े लिखे अंग्रेजी बोलने वाले सज्जन के सामने गवांर लगता है. ज्यों ही कोई अंग्रेजी में वार्तालाप करता है हमारी निगाहों में उसके लिए एक विशेष सम्मान झलकने लगता है. और हम उसकी एक कृपा दृष्टि पाने की होड़ में लग जाते हैं 
 
अब वक्त आ गया है जब हमें अपनी इस सड़ी-गली मानसिकता को अलविदा कहना होगा अन्यथा प्रतिभा संपन्न होते हुए भी हम पिछड़ जायेंगे और हमारी कुशलता जिस पर भारत सरकार करोड़ों रुपिया खर्च करके देश के लिए तैयार करती है उसका लाभ दूसरे देश उठा लेंगे. हमे भारतीय होने का गर्व होना चाहिए न कि शर्म.
वीणा सेठी


Wednesday, July 18, 2012

अलविदा राजेश खन्ना ................एक भावभीनी श्रद्धांजलि

सफ़र

 
जिंदगी एक सफ़र है,
जो शुरू हुआ है तो खत्म भी होगा;
आज मेरा नंबर है,
कल किसी और का होगा.
यहाँ आना जाना तो लगा ही रहेगा;
बात केवल इतनी है;
किसी का जाना दिल दुख देगा,
किसी का जाना दिल हिला देगा.

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किसी के जाने से हम आंसू बहाया करते हैं,
किसी के जाने से हम मुस्कराया  करते हैं.
पर दोनों ही जाने में फर्क इतना है;
एक के जाने में खोना लिखा होता है.
और एक के जाने में मिलन होता है.

Wednesday, July 11, 2012

हमारी सार्वजानिक मान्यताएँ


हमारी सार्वजानिक मान्यताएँ 


भारतीय जीवन रस-रंग व उत्सव का जीवन है. जीवन व्यक्तिगत व सार्वजनिक दो रूपों मैं विभक्त है, उसी के अनुसार ही हमारी व्यक्तिगत  और सार्वजनिक सोच  एवं मान्यताएं भी  हैं.सार्वजानिक मान्यताएं काफी प्रचलित तथा प्रयोगधर्मिता  के दायरे में आती हैं, प्रायः यही लगता है कि ये सार्वजनिक शिष्टाचार का उल्लंघन कर रही हों. इन मान्यताओं का दायरा प्रायः सम्पूर्ण भारत वर्ष में फैला हो सकता है.  भारत के दक्षिण में यह संकुचित रूप में प्रचलित हो किन्तु उत्तर एवं मध्य भारत में यह सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है. भारत में यदि धर्मनिरपेक्षता और पूर्ण प्रजातंत्र देखना हो तो तो इन मान्यताओं में आप खुलकर देख सकते हैं.
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आइये कुछ  सार्वजनिक मान्यताओं कि जिनसे पाठक गण भी प्रायः विदित हैं फिर से एक बार जान लें:-
लघुशंका का निवारण:- प्रायः  आम आदमी शंकाओं से घिरा रहता है और लाघुशंकाओं से तो और भी अधिक. ये शंका घर से बाहर निकलकर ही घेरती हैं  और व्यक्ति उसके निवारण के लिए प्रयासरत रहता है और वास्तव में इस शंका का निवारण जब तक न हो इन्सान सहज ही नहीं हो पाता . किसी भी शहर के गली, दीवारों कि आड़, वृक्ष के पीछे कहीं भी लोग अपनी इस शंका का निवारण करते देखे जा सकते हैं और ये भारत के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा इस कदर बन चुका है कि आम सहमती इसे मान्यता के रूप में स्थापित कर चुकी है जिसका विरोध करने का साह्स किसी में भी नहीं.

अभिनन्दन कि परम्परा:- मात अभिनन्दन कि परम्परा भारत में बहुत पुरानी है. ये संस्कारों में रची- बसी है. माँ के प्रति आदर कि भावना घर और सार्वजनिक जीवन में प्रत्यक्ष देखी जा सकती  है और ये इतनी  अधिक स्थापित हो चुकी है कि प्रेम या क्रोध में होने पर  गाली के रूप में धड़ल्ले से प्रयोग में लाई जाती है और इसे सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त है. लोगों में यह प्रचलन बेशक शर्मनाक  लग सकता है किन्तु यह सामाजिक रूप से बुरा  नहीं लगता यदि किसी को बुरा भी लगे तो विरोध करने के लिए इस मान्यता में स्थान ही नहीं है. और तो और बोलीवुड कि फिल्मों में भी आजकल ये एक फैशन के रूप में आ रहा है. माँ का गाली के रूप में प्रयोग एक ऐसे देश में जहाँ नारी कि पूजा करने कि हिदायत दी गई हो वो भी वेदों में तो इस तरह का आचरण वाकई शर्मनाक  है और इस पर लगाम स्वविवेक से ही लगे जा सकती है. 

रंगाई-छपाई कि कारीगरी:- छपाई प्रथा के रूप  में सर्वसाधारण में व्याप्त है. राह चलते कहीं भी छपाई का कार्क्रम करने कि पूरी स्वंत्रता प्राप्त है. ये वह क्षेत्र  है जिसे कानूनन  अपराध नहीं माना जाता है ये बात अलग है कि सार्वजनिक स्वच्छता हमारी किताबों में लिखी है परन्तु वह भी सिर्फ पढ़ने के लिए शेष है. आइये आपको छपाई के प्रकार बताएं- रास्ते चलते आप कही भी थूक सकते हैं और अपनी छपाई करके किसी को भी कृतार्थ कर सकते हैं. क्या मजाल कोई इसका विरोध कर सके क्योकिं इसके लिए इस चलन का प्रदर्शन करने वाला इतना समय ही नहीं देता कि आप सम्हल जाये, ये छपाई बिना पूर्व सूचना के कि जाती है. दूसरी छपाई कुल्ले के रूप में होती है, जिसका क्षेत्र कुछ विस्तृत होता है. तीसरी तरह कि छपाई सबसे खतरनाक होती है, पान खाकर अक्सर लोग उसे थूकने के मर्ज के शिकार होते हैं और जब भी वे इसे मुंह से बाहर फेकते हैं, इसकी छपाई लाल रंग में अवतरित होती है और स्थाई प्रभाव छोडती है. इस सार्वजनिक मान्यता का भुक्तभोगी विरोध के रूप में  गाली- गुफ्तार कर ले पर इसे स्वीकार तो करना ही पड़ेगा. 
मुफ्त की रंगाई -छपाई 
कचरे की मान्यता:- कचरा फेकने की प्रतियोगिता हर गाली-कूंचे व हर शहर में देखी  जा सकती है.अपने घर का कचरा किसी के भी घर के सामने या कहीं  भी ये सोच कर फेंका  जा सकता है की सारा भारत हमारा है बल्कि हम तो विश्व बंधुत्व की भावना भी रखते हैं. अगर कोई इस अपनत्व की भावना को न समझकर क्रोध करे तो उसकी नादानी पर गुस्सा न करके उसे बताये की ये आपका अपनापन दिखाने का तरीका है और  इससे अच्छा तरीका  कोई और हो ही नहीं सकता . यदि अगली बार कोई अपने आस-पड़ोस से अपनापन जाहिर करना चाहता हो तो अपने घर का कचरा उनके घर के सामने फेंक आये और उन्हें कृतार्थ करें बाकि इस मान्यता का अगला  चरण वे अपने आप तय कर लेंगे.
सहूलियत का कचरा 
  ये हैं हमारी  कुछ सार्वजानिक मान्यताएं आशा है यदि आप ने इन्हें अभी तक अमल में  नहीं लाया है तो जल्दी ही इन्हें आजमाएंगे जरुर.


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Friday, June 29, 2012

अतिक्रमण: एक अनैतिक अधिकार


अतिक्रमण: एक अनैतिक अधिकार

सरकारी सम्पति: व्यक्तिगत कब्ज़ा

भारत के महानगर से लेकर गाँवों तक सरकारी जमीन पर कोई भी इन्सान कभी भी अपने व्यक्तिगत ऊपयोग हेतु कब्ज़ा कर लेता है और दूसरों को उसकी इस हरकत से कोई परेशानी हो सकती है इस विषय पर वह सोचना ही नहीं चाहता. पिछले २०-२५ सालों में इस आदत ने अधिकार की शक्ल अख्तियार कर ली है. और अब ये जीवन का हिस्सा बन चुकी है.
अतिक्रमण एक महामरी की शक्ल ले चुका है इससे पहले की ये
लाइलाज बीमारी बन जाए , इसके लिए सरकार व आम नागरिक को अपना कर्त्तव्य समझकर इस आदत का परित्याग कर देना चाहिए, अन्यथा जब सरकारी अमला डंडे की भाषा में समझाएगा तो विरोध भी काम नहीं आएगा.और सरकार, नगर पालिका तथा नगर निगम को भी इस तरह की गतिविधियों पर समय रहते अंकुश लगाना चाहिए.


भारत में यूँ तो 4 मौसम होते हैं, ग्रीष्म , वर्षा, शरद और बसंत. पर इन सबके ऊपर एक ऋतु और है जो भारत के हर नगर और गाँव में छाई है. जिसका नाम है 'अतिक्रमण'. भारत में ये प्रथा बनती जा रही है, आप जहाँ जायेंगे अतिक्रमण ही नजर आएगा. लगता है वो दिन दूर नहीं जब इसे संविधान द्वारा  नागरिकों के मूलभूत अधिकारों में शामिल कर लिया जायेगा. जिस व्यक्ति को देखो वो सकरी सम्पति, जमीं, यहाँ तक की हवा- पानी का अतिक्रमण करने का मानो अधिकार प्राप्त कर चूका है.
अतिक्रमण 
जिस भी व्यक्ति के पास अपना मकान या दुकान है वो उसके आगे की खाली पड़ी जमीन जो की अमूमन सरकारी ही होती है को अपनी व्यक्तिगत जायदाद मानकर उपयोग में लाने लगते हैं. यही कारण है की सरकारी नालियां, गलियां ,सड़कें यानें की जो भी सरकारी जगह है सब संकुचित होती जा रही है और लोगों की जगहों का दायरा अपनेआप बढ़ता जा रहा है. अतिक्रमण की ये बेशर्म  मानसिकता का ये जिन्दा साक्ष्य हर एक के सामने है क्योंकि अधिकतर इस बेशर्मी को जी रहे हैं.

भारत के किसी भी शहर, नगर या गाँव में चले जाइये, अतिक्रमण का नजारा आम देखने को मिल जायेगा. दुकानदार अपनी दुकान का सामान दुकान से बाहर सड़क के उपर भी रखने में गुरेज नहीं करते, सरकारी नालियीं भी उनके  अतिक्रमण की शिकार हैं.उसे भी ढांककर उसपर दुकान की सीढियाँ  या सामान रखने की जगह निकल लेते हैं. यहाँ-वहां वाहन खड़े करके ट्रेफिक में बाधा डालना बड़ी आम सी आदत है. मजेदार बात ये है की किसी को इस से कोई परेशानी नहीं होती, लोग अनदेखी  करके  निकल जाते हैं. जो अतिक्रमण नहीं कर पाते वो अपने पालतू जानवरों को खुला छोड़कर अपनी इच्छा पूरी कर लेते हैं.
भारतीय
जनमानस की मानसिकता इस कदर ख़राब हो चुकी है की वह नागरिक कर्तव्यों को ही भूल गई है जिसमे 'सार्वजानिक सम्पति के दुरुपयोग को रोकने' का कर्तव्य भी शामिल है. अब तो हाल ये है की कहाँ सरकारी  जमीन है और कहाँ व्यक्तिगत पता ही नहीं चलता.
रकारी भूमि पर धार्मिक स्थल का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है, धार्मिक आस्था के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने में लोग लगे हैं. अतिक्रमण की खुली छूट के चलते ही लोग अब इसको अपना अधिकार समझकर जीने लगे है, यही कारण है की जब भी अतिक्रमण विरोधी मुहीम चलता है तो विरोध की पुरजोर आंधी के सामने टिक नहीं पाता. भारतीय  जनमानस की ये मानसिकता बेहद लज्जाजनक है, पर वे इस बात को समझने क्या  मानने को तैयार नहीं. अगर ऐसे ही अतिक्रमण रूपी अधिकार का प्रयोग होता रहा और प्रशासन ऑंखें मूंदे पड़े रहा और मौन बैठा रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सरकारी जमीन, सम्पति सब लोगों के कब्जे में बिना हस्तांतरण व रजिस्ट्री कराए पहुँच जाएगी और फिर जब अतिक्रमण विरोधी कार्यवाही करने की सरकारी अमले की बारी आएगी तो उसे गत वर्षों में जो विरोध दिल्ली तथा गाजियाबाद में सहना पड़ा वैसे ही हर जगह न सहना पड़े.
हमें भी अपनी बेशर्म मानसिकता को छोड़ना होगा और इस अघोषित मौलिक अधिकार का परित्याग करना चाहिए और संविधान के नागरिक कर्तव्यों में से सार्वजानिक सम्पति की रक्षा का कर्तव्य का पालन करना चाहिए. इसके साथ ही सरकार को सोये नहीं रहना चाहिए बल्कि जहाँ भी अतिक्रमण हो रहा हो उसे समय रहते रोके और समय समय पर सरकारी जमीन का निरिक्षण व आकलन करते रहे.